प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ : एक यात्रा संस्मरण

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” चंद्रमा का एक नाम सोम भी है, उन्होंने भगवान्‌ शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहाँ तपस्या की थी। अतः इस ज्योतिर्लिंग को सोमनाथ कहा जाता है . इसके दर्शन, पूजन, आराधना से भक्तों के जन्म-जन्मांतर के सारे पाप और दुष्कृत्यु विनष्ट हो जाते हैं। शिव पुराण में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को पृथ्वी के सभी ज्योतिर्लिंगों में से प्रथम बताया गया है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। इसी मंदिर के समीप अरब सागर की लहरों ने भी मुझे प्रभावित किया..दरअसल, लहरों से बड़ा किसी और का दर्द नहीं होता…हर बार किनारे को कसकर थामने की आरज़ू लिए युगों से परेशान यह लहरें…किनारे के न मिलने पर कई बार बेचैन हो ये सुनामी जैसा तांडव भी करती हैं। यात्रा के दौरान कुछ ऐसी अनुभूतियां होती है जिनको सिर्फ अनुभूत किया जा सकता है।ऐसी कुछ अनुभूति को मैने शब्दों द्वारा लिखने का प्रयास किया है मेरे इस संस्मरण में…….”

                                                                          डॉ वंदना मिश्र मोहिनी,Indore✍️

यात्रा हमारे जीवन का एक अभिन्न हिस्सा हैं, और प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में यात्रा जरूर करता हैं. यात्रा करने से नये अनुभव, नये लोगो, नये विचार, नई उर्जा, एक अलग संस्कृति व प्रकृति से साक्षात्कार होता है।

हमारी यह यात्रा थी गुजरात राज्य जो की अरब सागर में फैला हुआ, रेगिस्तान के संकेत के साथ और 1600 किलोमीटर लंबी तटरेखा के साथ गुजरात – राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का गृह राज्य है। यह अपने समुद्र तट, मंदिर शहरों और ऐतिहासिक राजधानियों के लिए प्रसिद्ध है।

ऐसे तो यह हमारी आध्यत्मिक यात्रा रही जिसमे सर्वप्रथम इंदौर से सोमनाथ की ओर ट्रैन का सफर बड़ा ही आनंद दायक रहा। सोमनाथ की धरती पर कदम पड़ते ही असीम शान्ति का अनुभव हुआ।सोमनाथ के बारे में कई किस्से प्रसिद्व है।ऐसा कहा जाता है कि इस मन्दिर को कई बार तोड़ा गया।

वर्तमान काल में जो मंदिर हम आज देख रहे हैं वह भारत के पूर्व गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 1950 में बनवाया था। साथ पहली बार 1995 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ,भोपाल की माटी के सपूत डॉ शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र के शिवभक्तों को और जनता को सौंप दिया था। 6 बार आक्रमणों को सहने के बाद भी यह मंदिर आज भी अपने भव्यता और सुंदरता के लिए विश्व में प्रख्यात है।

पावन प्रभास क्षेत्र में स्थित इस सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कन्दपुराणादि में विस्तार से बताई गई है। चंद्रमा का एक नाम सोम भी है, उन्होंने भगवान्‌ शिव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहाँ तपस्या की थी। अतः इस ज्योतिर्लिंग को सोमनाथ कहा जाता है इसके दर्शन, पूजन, आराधना से भक्तों के जन्म-जन्मांतर के सारे पाप और दुष्कृत्यु विनष्ट हो जाते हैं। वे भगवान्‌ शिव और माता पार्वती की अक्षय कृपा का पात्र बन जाते हैं। मोक्ष का मार्ग उनके लिए सहज ही सुलभ हो जाता है। हमें भी भगवान शिव के दर्शन से ऐसे ही अनुभूति हुई जिसे शब्दो से व्यक्त करना मुश्किल है।

पास में समुद्र ऐसा लगा मानो उसकी हर लहर एक कहानी कह रही हो। ऐसे भी लहरों के बारे में मेरा सोचना है कि- लहरों से बड़ा किसी और का दर्द नहीं होता…हर बार किनारे को कसकर थामने की आरज़ू लिए युगों से परेशान यह लहरें…किनारे के न मिलने पर बेचैन सुनामी जैसा तांडव करती हैं।

पास में इंदौर की महारानी अहित्या बाई द्वारा स्थापित किया गया पुराना सोमनाथ मंदिर ।जहां पर होलकर वंश का चिन्ह व अहित्या माता की प्रतिमा देखकर हम इंदौर वासी अपने आप को गौरान्वित महसूस कर रहे थे।

ऐसे तो सोमनाथ में देखने की दृष्टि से बहुत सारे स्थान है,पर समय आभाव के कारण हम कुछ विशेष स्थान जैसे सूर्य मन्दिर,भालका तीर्थ,श्री परशुराम मन्दिर,गीता मन्दिर,त्रिवेणी घाट,लक्ष्मीनारायण मन्दिर व सोमनाथ बीच हम देख सके।जो बेहद अनूठा अनुभव रहा।सोमनाथ का मौसम अप्रैल माह में हमारी सोच के विपरीत बहुत ठंडा था। जिसके कारण हमारी यात्रा ओर सुलभ हो गई।

अब हमारा अगला पड़ाव था द्वारका ,भगवान कृष्ण की कर्मभूमि द्वारका की धरती पर कदम रखते ही लगा जैसे कण-कण मे कृष्ण का वास हो।कहते है इसका द्वारका का नाम इसलिये पड़ा क्योंकि शहर के चारों ओर बहुत ही लंबी दीवार थी जिसमें कई द्वार थे।

कई द्वारों का शहर होने के कारण ही इसका नाम द्वारिका पड़ा। ऐसा माना जाता है कि 5000 वर्ष पहले, द्वारका श्री कृष्ण की नगरी थी, जिसे भगवान विश्वकर्मा ने बनाया था, पहले तो मथुरा ही भगवान श्री कृष्ण की राजधानी थी। पर मथुरा छोड़ने के बाद उन्होंने द्वारका बसाई थी।जो महाभारत में भी वर्णित हैं । 36 वर्ष राज्य करने के बाद श्री कृष्ण की मृत्यु के बाद द्वारिका के समुद्र में डूब जाने और यादव कुलों के नष्ट हो जाने के बाद यदुओं की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए कृष्ण के प्रपौत्र वज्र अथवा वज्रनाभ द्वारिका के यदुवंश के अंतिम शासक थे।

मान्यता है कि इस स्थान पर मूल मंदिर का निर्माण भगवान श्री कृष्ण के बड़े परपौत्र वज्रनाभ ने करवाया था। कालांतर में मंदिर का विस्तार एवं जीर्णोद्धार होता रहा। मंदिर को वर्तमान स्वरूप 16वीं शताब्दी में प्राप्त हुआ था। भगवान श्री कृष्ण की द्वारिका वर्तमान मंदिर से 9 किलोमीटर पानी के अंदर 100 मीटर नीचे डुबी हुई हैं ।
द्वरिका में पहुँच कर पहले हमने भेट द्वारका जाने का निश्चय किया,। मन मे बहुत कौतूहल था ,नाव में बैठ कर समुद्र पार करने का। कहा जाता – द्वारका का नाम भेट द्वरिका इसलिए पड़ा ऐसी मान्यता है, की यही पर भगवान् श्रीकृष्ण और सुदामा की भेंट हुई थी। इसका नाम तो भेट द्वारका था बाद में कहते कहते बेट द्वारका पड़ गया।

सुदामा- कृष्ण के मन्दिर को देख मन भाव विभोर हो गया,जहां हमने देखा एक सच्ची मित्रता की जीती जागती मिशाल ।वापसी में गोपी तालाब जहां प्रसिद्ध गोपी चंदन मिलते है।जिन्हें हम लेने से अपने आप को रोक न सके।

मार्ग मे रुक्मणि मन्दिर पड़ा ।रुक्मिणी मंदिर में प्रवेश करते से ही वहां के पंडित आप को रोक कर सर्वप्रथम रुक्मिणी की कथा सुनायेंगे। तत्पश्चात छोटे छोटे जत्थों में आपको मुख्य मंदिर के भीतर प्रवेश की अनुमति देंगे।

मंदिर के भीतर प्रवेश करते ही रुक्मिणीजी की मनमोहक छवि आपका मन मोह लेगी। मंदिर की भीतरी भित्तियों पर भी उनसे जुड़े अनेक प्रसंगों को सुन्दरता से चित्रित किया गया है। इनसे आप अनुमान लगा सकते हैं कि जनमानस में उनकी कितनी महत्ता रही है।
अब हम पहुँचे नागेश्वर ज्योतिर्लिंग कहते है कि -यह बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है , जो शिव को समर्पित मंदिर हैं।

इस ज्योतिर्लिंग के लिए तीन दावा किए गए स्थान हैं। शिवपुराण के अनुसार, नागेश्वरज्योतिर्लिंग गुजरात में द्वारका के पास स्थित है । एवम] हिंगोली का महाराष्ट्र जिला औंधा नागनाथ मंदिर का घर है , जिसे इस ज्योतिर्लिंग से भी पहचाना जाता है ।

 

कुछ लोगों का मानना ​​है कि उत्तराखंड में जागेश्वर शिवलिंग नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का प्रतिनिधित्व करता है।खेर सबकी अलग- अलग मान्यता है ।हमे शिव के दर्शन करके लगा मानो अमरत्व की प्राप्ति यही है।

साँझ होते ही हम चले द्वारकाधीश धाम के मंदिर में सर्वप्रथम दर्शन हुये मन्दिर के शिखर पर लहराते ध्वज जिसे देख ह्रदय रोमांचित हो गया।

ऐसा मानना है कि-धार्मिक महत्व के तहत मंदिर के ऊपर का ध्वज सूर्य और चंद्रमा को दर्शाता है, जो माना जाता है कि यह दर्शाता है कि कृष्ण तब तक रहेंगे जब तक सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी पर मौजूद रहेंगे। ध्वज को दिन में 5 बार से बदल दिया जाता है,।यह द्वारकाधीश मंदिर का ध्वज पूरे 52 गज का होता है।

इसके पीछे के कई मिथक हैं। एक मिथक के अनुसार 12 राशि, 27 नक्षत्र, 10 दिशाएं, सूर्य, चंद्र और श्री द्वारकाधीश मिलकर 52 होते हैं। एक और मान्यता है कि द्वारका में एक वक्त 52 द्वार थे।यह भक्तो द्वारा दान स्वरूप भेट किया जाता है।

मन्दिर परिसर में पहुँच कर असीम शान्ति ,सुकून मिल रहा था जैसे ही द्वराकधीश के पट खुले और प्रतिमा को देख बरबस नेत्रों से प्रेम मिश्रित अश्रु धारा बहने लगी।इतना मनोहारी छवि श्री कृष्ण जी की ह्रदय का पुलकित हो गया।कतार में खड़ी कई स्त्रियां कृष्ण की इस मनोहारी रूप की कभी नजर उतारती,कभी बलैया लेती।मेरा मानना है कि- कृष्ण एकमात्र ऐसे है जिन्हें हर उम्र की स्त्री ने प्रेम किया।बालस्वरूप में कान्हा,युवा में हर युवती ने प्रेमी के रूप में,बुजुर्ग ने उन्हें पुत्र समान लाड़ किया।आज भी कृष्ण से ऐसा लाड़ जताया जाता है।दर्शन से मन ही नही भर रहा था कितनी बार पलट- पलट कृष्ण को मैने निहारा मुझे पता नही।अनुभूत हुआ जब गोपियां कृष्ण को देखती होगी तो शायद ऐसी दशा रही होगी।
मन्दिर में हमने कृष्ण की 8 पटरानी की प्रतिमा के दर्शन भी किये।
अब हम चले गोमती के तट पर जो श्री कृष्ण को बड़ी प्यारी है,ऐसा मुझे मेरी माँ ने बताया था।।भागवत पुराण के अनुसार यह पाँच दिव्य नदियों में से एक पवित्र नदी है।पास में हो सुदामा सेतु को देखा।द्वरिका से जाने को मन ही नही कर रहा था ।पर अगली यात्रा भी करनी थी।अगले दिन हम निकल पड़े अहमदाबाद की ओर मार्ग में साबरमती नदी पर झिलमिल रोशनी में बहुत सुंदर लग रही थी।
पहले हम पहुँचे स्टेच्यू ऑफ यूनिटी देखने केबडिया –
स्टैच्यू ऑफ यूनिटी भारत के अग्रणी राजनेताओं और नेताओं में से एक – सरदार वल्लभभाई पटेल को 182 मीटर ऊंची प्रतिष्ठित श्रद्धांजलि है। स्मारक निर्माणाधीन है और विंध्याचल और सतपुड़ा पर्वतमाला के बीच स्थित है, जो नर्मदा नदी में साधु-बेट द्वीप पर है, जो की गुजरात में प्रसिद्ध सरदार सरोवर बांध से लगभग 3.5 किमी नीचे की ओर है।जहां हमने देखा
सुंदर सर्वसुविधायुक्त आधुनिक परिसर, आर्ट गैलरी जिसे देख लगा एक महान व्यक्तित्व श्री सरदार पटेल को इससे बड़ी श्रद्धांजलि ओर कुछ हो नही सकती।
अब हमने बाहर आकर भोजन किया । साथ मे ही हमने देखी फ्लॉवर ऑफ वेली फूलो से मुझे बेहद लगाव है जब भी फूलो दे लदी डाली देखती मन रोमांच से भर जाता है।
अब हमारी यात्रा समाप्ति की ओर थी दूसरे दिन हमने अहमदाबाद में साबरमती आश्रम का भ्रमण किया। गांधी जी की जीवन यात्रा ,उनका चरखा ,उनकी प्रतिमा अवलोकन कर हम ने योजना बनाई अक्षरधाम की पर पता चला की सोमवार होने के कारण बंद रहता ।फिर शाम सात बजे हमारी वापसी की ट्रेन थी।हमने अपनी यात्रा को यही विराम दिया।ओर निकल पड़े अपने धाम इंदौर।
मैने जाना कि-एक किताब पढ़ने से जितना सीखते हैं उसका हजार गुना हम यात्रा करने से सीखते हैं.मूझे फोटोग्राफी का बेहद शोक रहा है इसलिए हर स्थान के कई फ़ोटो हमने अपने कैमरे में कैद किये जो यादों को ताजा कर रहे थे।
सबसे अच्छी यात्राएं, सबसे अच्छे प्यार की तरह होती हैं जिसका वास्तव कभी में अंत नही होता।
यात्रा जीवन का वह सुखद अनुभव हैं जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता हैं.फिर भी मैने छोटा सा प्रयास किया।आनंद लीजिये।

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