फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को स्कंद षष्ठी व्रत रखा जाता है. इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र भगवान कार्तिकेय (Lord Kartikeya) की पूजा की जाती है. भक्त भगवान कार्तिकेय को खुश करने में लगे होते हैं. ऐसे में कल स्कंद षष्ठी व्रत रखा जाएगा. इस दिन भक्त पूरे विधि विधान से भगवान कार्तिकेय की पूजा करते हैं और व्रत रखकर पूरे ध्यान से कथा पढ़ते हैं. मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से लोग काम, क्रोध, मोह, अहंकार से मुक्ति पा सकते हैं. धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कन्द की छह कृतिकाओं ने स्तनपान करा कर रक्षा की थी. उनके 6 मुख हैं और उन्हें कार्तिकेय नाम से पुकारा जाने लगा.
भोलेनाथ और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय की पूजा मुख्य रूप से दक्षिण भारत में होती है. भगवान कार्तिकेय के प्रमुख मंदिर तमिलनाडु में मौजूद हैं. मान्यता है कि स्कंद षष्ठी की उपासना से च्यवन ऋषि को आंखों की ज्योति प्राप्त हुई. वहीं स्कंद षष्ठी के पाठ से प्रियव्रत का मृत शिशु जीवित हो गया था.
स्कंद षष्ठी पूजा विधि
स्कंद षष्ठी की पूजा शुरू करने से पहले भगवान कार्तिकेय के साथ भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा को एक साफ चौकी पर स्थापित करें. उस पर घी, दही, जल और पुष्प से अर्घ्य प्रदान कर कलावा, अक्षत, हल्दी, चंदन, इत्र का अर्पण करें. पूजा के दौरान कार्तिकेय मंत्र- देव सेनापते स्कंद कार्तिकेय भवोद्भव। कुमार गुह गांगेय शक्तिहस्त नमोस्तु ते॥ का जाप करें. शाम के समय पूजा के उपरांत भजन और कीर्तन करें. ब्रह्मपुराण में उल्लेख है कि स्कन्द की उत्पत्ति अमावस्या को अग्नि से हुई थी.
वह फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को प्रत्यक्ष हुए थे. देवों के द्वारा सेनानायक बनाए गए थे और तारकासुर का वध किया था. इसलिए उनकी पूजा, दीपों, वस्त्रों, अलंकारों से की जाती है. साथ ही, स्कंद षष्ठी पर भगवान शिव और माता पार्वती की भी पूजा की जाती है. कार्तिकेय की स्थापना कर अखंड दीपक जलाए जाते हैं. विशेष कार्य की सिद्धि के लिए इस समय की गई पूजा-अर्चना विशेष फलदायी होती है.


