कहते हैं ,जैसी करनी ,वैसी भरनी । प्रदेश के चार विधायकों को ही लीजिए। खरगापुर के विधायक राहुल लोधी ने तत्कालीन महिला विधायक की राह में कांटे बोवने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। पलटवार में यही कांटे उन्हें ऐसे चुभे कि सुप्रीम कोर्ट में अपील के बावजूद विधायकी खतरे में है ।
यह लोकोक्ति तो कुछ और है लेकिन गुजरात चुनाव में भाजपा को मिली बंपर जीत ने पार्टी नेताओं के लिए इसके मायने बदल दिए। मप्र से ही शताधिक नेता व कार्यकर्ता पार्टी उम्मीदवारों के प्रचार में वहां पहुंचे ।
चुनाव व अटकलों का चोली-दामन का नाता है। गुजरात ,हिमाचल के बाद अब अगले साल मप्र समेत तीन राज्यों के चुनाव होना है।
‘सरकार’ हो या विपक्षी विधायक । चुनाव में साल भर से भी कम समय देख धड़कनें सबकी बढ़ी हुई हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बीते एक पखवाड़े के दौरान ही सार्वजनिक मंच से दर्जनभर से अधिक अधिकारी, कर्मचारियों को निलंबित कर चुके हैं। वहीं मंच को जनता की अदालत बताकर कई अधिकारियों से सार्वजनिक तौर पर सवाल-जवाब भी किए।
असंतुष्टों को साधना कोई भाजपा से सीखे । करीब साल भर से रूठे दमोह के वयोवृद्ध नेता जयंत मलैया को मनाकर भाजपा ने बुंदेलखंड में खोते जनाधार को वापस पटरी पर लाने का जतन किया है । बताया जाता है कि मलैया को नोटिस थमा की गई गलती को सुधारने की स्क्रिप्ट तो राष्ट्रीय नेतृत्व के निर्देश पर पहले ही लिख ली गई थी।
लगातार सिमटती जा रही कांग्रेस को अब लगता है विरोधियों की भी जरूरत नहीं। उसके कुछ बुजुर्ग नेता समय-समय पर यह भूमिका बखूबी निभा रहे हैं। इनकी फेहरिस्त लंबी है ,लेकिन बानगी के लिए फिलहाल दो ही नाम काफी है।
ग्वालियर की कैंसर पहाड़ी अपने नाम को लेकर इन दिनों चर्चा में है। अस्पताल की पहचान के तौर पर आम बोलचाल में शुरू हुआ यह नाम लोगों की जुबान पर ऐसा चढ़ा कि चलन बन बैठा।
सरकार ने सीपीए को ख़त्म कर इसका काम दो विभागों को सौंप दिया। बहुत अच्छा किया। कामकाज का बंटवारा भी हो गया , लेकिन बजट का नहीं। नतीजतन ,शहर के कई पार्क उजाड़ होने को हैं या बिजली कनेक्शन कटने से अँधेरे में ,फिर वह अफसरों का पसंदीदा एकांत पार्क हो या अशोका गार्डन का नया नवेला विवेकानंद पार्क।